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Sampurn Swasti Vachan Mantra with meaning | स्वस्ति वाचन मंत्र
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ॐ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।
देवा नो यथा सदमिद्वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे-दिवे॥

मन्त्र अर्थ - हमारे समीप चारों ओर से ऐसे कल्याणकारी विचार आते रहें जो किसी से न प्रभावित हों, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। प्रगति को न बाधित करने वाले तथा सदैव रक्षा में तत्पर देवता प्रतिदिन हमारी वृद्धि के लिये तत्पर रहें।

ॐ देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो निवर्तताम्।
देवानां सख्यमुपसेदिमा वयं देवा न आयुः प्रतिरन्तु जीवसे॥

मन्त्र अर्थ - यजमान की इच्छा रखने वाले देवताओं की कल्याणकारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा हमारे सम्मुख रहे, देवताओं का दान हमें प्राप्त हो, हम देवताओं की मित्रता प्राप्त करें, देवता हमारी आयु में जीवन के निमित्त वृद्धि करें।

ॐ तान् पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्।
अर्यमणं वरुणं सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्॥

मन्त्र अर्थ - हम वेदरुप सनातन वाणी के द्वारा अच्युतरुप भग, मित्र, अदिति, प्रजापति, अर्यमण, वरुण, चन्द्रमा एवं अश्विनीकुमारों का आवाहन करते हैं। ऐश्वर्यमयी सरस्वती महावाणी हमें सभी प्रकार का सुख प्रदान करें।

ॐ तन्नो वातो मयो भुवातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः।
तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम्॥

मन्त्र अर्थ - वायुदेवता हमें सुखकारी औषधियाँ प्राप्त करायें। माता पृथ्वी एवं पिता स्वर्ग भी हमें सुखकारी औषधियाँ प्रदान करें। सोम का अभिषव करने वाले सुखदाता ग्रावा उस औषधरुप अदृष्ट को प्रकट करें। हे अश्विनी-कुमारों! आप दोनों सभी के आधार हैं, हमारी प्रार्थना स्वीकार करें।

ॐ तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम्।
पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥

मन्त्र अर्थ - हम स्थावर-जंगम के स्वामी, बुद्धि को सन्तोष प्रदान करने वाले रुद्रदेवता का रक्षा के निमित्त आवाहन करते हैं। वैदिक ज्ञान एवं धन की रक्षा करने वाले, पुत्र आदि के पालक, अविनाशी पुष्टि-कर्ता देवता हमारी वृद्धि एवं कल्याण के निमित्त हों।

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

मन्त्र अर्थ - महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें, जिसको संसार का ज्ञान है तथा जिसका सब पदार्थों में स्मरण है, समस्त प्राणियों के पोषणकर्ता वे पूषा (सूर्य) हमारा कल्याण करें। जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें।

ॐ पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभं यावानो विदथेषु जग्मयः।
अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह॥

मन्त्र अर्थ - चितकबरे वर्ण के घोड़ों वाले, अदिति माता से उत्पन्न, सभी का कल्याण करने वाले, यज्ञशालाओं में जाने वाले, अग्निरुपी जिह्वा वाले, सर्वज्ञ, सूर्यरुप नेत्र वाले मरुद्गण एवं विश्वेदेव देवता हविरुप अन्न को ग्रहण करने के लिये हमारे इस यज्ञ में पधारें।

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवागं सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥

मन्त्र अर्थ - हे यजमान के रक्षक देवताओं! हम दृढ़ अङ्गों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुये कानों से कल्याणपूर्ण वचनों का श्रवण करें, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं का दर्शन करें, देवताओं की उपासना-योग्य आयु को प्राप्त करें।

ॐ शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्राजरसं तनूनां।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मानो मध्यारीरिषतायुर्गन्तोः॥

मन्त्र अर्थ - हे देवताओं! आप सौ वर्ष की आयु-पर्यन्त हमारे समीप रहें, जिस आयु में हमारे शरीर को जरावस्था प्राप्त हो, जिस आयु में हमारे पुत्र पिता अर्थात् पुत्रवान् बन जायें, हमारी उस गमनशील आयु को आप लोग मध्य में खण्डित न होने दें।

ॐ अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः।
विश्वेदेवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्॥

मन्त्र अर्थ - अखण्डित पराशक्ति स्वर्ग है, वही अन्तरिक्ष-रुप है, वही पराशक्ति माता-पिता एवं पुत्र भी है। समस्त देवता पराशक्ति के ही स्वरुप हैं, अन्त्यज सहित चारों वर्णों के सभी मनुष्य पराशक्तिमय हैं, जो उत्पन्न हो चुका है तथा जो उत्पन्न होगा, सब पराशक्ति के ही स्वरुप हैं।

पृथिवी शान्तिरन्तरिक्षगं शान्तिर्द्यौश्शान्तिर्दिशः शान्तिरवान्तरदिशाश्शान्तिरग्निश्शान्तिर्वायुः
शान्तिरादित्यश्शान्तिश्चन्द्रमाश्शान्तिर्नक्षत्राणि शान्तिरापश्शान्तिरोषधयश्शान्तिर्वनस्पतयश्शान्तिर्गौः
शान्तिरजा शान्तिरश्वश्शान्तिः पुरुषश्शान्तिर्ब्रह्म शान्तिर्ब्राह्मणश्शान्तिः शान्तिरेव शान्तिश्शान्तिर्मे अस्तु शान्तिः।

मन्त्र अर्थ - पृथ्वीलोक शान्तिदायक हो, अन्तरिक्षलोक शान्तिदायक हो, द्युलोक शान्तिदायक हो। समस्त दिशायें शान्तिदायक हों, अग्नि एवं वायु शान्तिदायक हो। सूर्य, चन्द्र एवं सम्पूर्ण नक्षत्र मण्डल शान्तिदायक हो, जल, औषधियाँ एवं वनस्पतियाँ शान्तिदायक हों। गौ, अश्व आदि पशु शान्तिदायक हों। पुरुष शान्तिदायक हो। ब्रह्म अर्थात् महान परमेश्वर हमें शान्ति प्रदान करने वाले हों। ब्राह्मण शान्तिदायक हों, उनका दिया हुआ ज्ञान एवं वेद शान्ति प्रदान करने वाले हों। सम्पूर्ण चराचर जगत शान्ति पूर्ण हो अर्थात् सर्वत्र शान्ति ही शान्ति हो। ऐसी शान्ति मुझे प्राप्त हो तथा उसमें सदा वृद्धि ही होती रहे। अभिप्राय यह है कि सृष्टि का कण-कण हमें शान्ति प्रदान करने वाला हो। समस्त पर्यावरण ही सुखद व शान्तिप्रद हो।


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