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गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र | Gajendra Moksham Stotram
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गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र -
हिंदू धर्म में कई मंत्रों और स्तोत्रों के बारे में बताया गया है, जिसका पाठ करने से मनुष्य को सुख शांति की प्राप्ति होती है। ऐसा ही एक स्तोत्र है गजेंद्र स्तोत्र। हिंदू धर्म के सबसे पहले ग्रंथ श्रीमद्भगवद गीता के तीसरे अध्याय में गजेंद्र स्तोत्र का वर्णन मिलता है। इसमें कुल 33 श्लोक हैं, जिसका पाठ करने से जीवन में किसी प्रकार की परेशानियों से तत्काल मुक्ति मिल जाती है। गजेंद्र स्तोत्र में हाथी और मगरमच्छ के साथ हुए एक भयंकर युद्ध का वर्णन किया गया है।

श्री शुक उवाच -
एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम ॥१॥

गजेन्द्र उवाच -
ऊं नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥२॥

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं ।
योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम ॥३॥

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
क्वचिद्विभातं क्व च तत्तिरोहितम ।
अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षते
स आत्म मूलोsवत् मां परात्परः ॥४॥




कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो
लोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु ।
तमस्तदाऽऽऽसीद गहनं गभीरं
यस्तस्य पारेsभिविराजते विभुः ॥५॥

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-
र्जन्तुः पुनः कोsर्हति गन्तुमीरितुम ।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥६॥

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम
विमुक्त संगा मुनयः सुसाधवः ।
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने
भूतात्मभूता सुहृदः स मे गतिः ॥७॥

न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वा
न नाम रूपे गुणदोष एव वा ।
तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यः
स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥८॥




तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेsनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे ॥९॥

नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥१०॥

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥११॥

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥१२॥

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥१३॥

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥१४॥

नमो नमस्तेsखिल कारणाय
निष्कारणायाद्भुत कारणाय ।
सर्वागमान्मायमहार्णवाय
नमोपवर्गाय परायणाय ॥१५॥




गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जित मानसाय ।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥१६॥

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोsलयाय ।
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-
प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥१७॥

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-
र्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय ।
मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय
ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥१८॥

यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा
भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।
किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं
करोतु मेsदभ्रदयो विमोक्षणम् ॥१९॥

एकान्तिनो यस्य न कंचनार्थ
वांछन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः ।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलं
गायन्त आनन्द समुद्रमग्नाः ॥२०॥

तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-
मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर-
मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥२१॥




यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः ।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥२२॥

यथार्चिषोsग्नेः सवितुर्गभस्तयो
निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः ।
तथा यतोsयं गुणसंप्रवाहो
बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥२३॥

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यंग
न स्त्री न षण्डो न पुमान न जन्तुः ।
नायं गुणः कर्म न सन्न चासन
निषेधशेषो जयतादशेषः ॥२४॥

जिजीविषे नाहमिहामुया कि-
मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या ।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम ॥२५॥

सोsहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम ।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोsस्मि परं पदम् ॥२६॥

योगरन्धित कर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोsस्म्यहम् ॥२७॥




नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-
शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये
कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥२८॥

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छ्क्त्याहंधिया हतम् ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोsस्म्यहम् ॥२९॥

श्री शुकदेव उवाच -
एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं
ब्रह्मादयो विविधलिंगभिदाभिमानाः ।
नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात
तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत् ॥३०॥

तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः
स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भि : ।
छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान –
श्चक्रायुधोsभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥३१॥

सोsन्तस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्त्तो
दृष्ट्वा गरुत्मति हरिम् ख उपात्तचक्रम ।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छा –
नारायणाखिलगुरो भगवन्नमस्ते ॥३२॥

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य
सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार ।
ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं
सम्पश्यतां हरिरमूमुच दुस्त्रियाणाम् ॥३३॥

- श्री गजेन्द्र कृत भगवान का स्तवन




गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का महत्व -
गजेंद्र मोक्ष की कथा के अनुसार, प्राचीन समय में द्रविड़ देश के नरेश इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के बहुत बड़े उपासक थे। वह रोजाना नियम से विष्णु जी अराधना करते थे। यही नहीं, ईश्वर धाम की प्राप्ति के लिए तप भी करते थे। एक समय ऐसा आया कि इंद्रद्युम्न राजपाट त्याग कर सन्यासी बन गए और मलय-पर्वत पर जाकर तप करने लगे। एक दिन महर्षि अगस्त्य उनके आश्रम पहुंचे, लेकिन ध्यान में लीन इंद्रद्युम्न ने महर्षि का स्वागत, सेवा नहीं की, जिससे अप्रसन्न होकर महर्षि ने इंद्रद्युम्न को जड़बुद्धि गज बनने का श्राप दे दिया। महर्षि अगस्त्य के श्राप से इंद्रद्युम्न हाथी बन गए।

इंद्रद्युम्न हाथियों के झुंड के मुखिया थे, इसलिए उनका गजेंद्र नाम था। एक दिन घूमते–घूमते गजेंद्र को बहुत तेज प्यास लगी। वह अन्य हाथियों के साथ पास के एक सरोवर में पानी पीने गए, तभी एक शक्तिशाली मगरमच्छ ने गजेंद्र के पैर को दबोच लिया और उसे सरोवर के अंदर खीचने लगा। गजेंद्र ने मगरमच्छ से बचने की बहुत कोशिश की, लेकिन वो खुद को छुड़ाने में सफल नहीं हो सका। गजेंद्र और मगरमच्छ का संघर्ष लगातार जारी रहा। धीरे-धीरे गजेंद्र की शक्ति कम पड़ने लगी और उसका शरीर शिथिल पड़ गया। आखिर में गजेंद्र दर्द से चीखने चिल्लाने लगा। उसके अन्य साथी हाथियों ने भी उसे बचाने का प्रयास किया, लेकिन वो भी असफल रहे।

गजेंद्र को जब अपना अंत नजदीक लगने लगा तो उसने भगवान विष्णु का ध्यान किया और पूरे भक्तिभाव से उन्हें पुकारने लगा। गजेंद्र ने कहा- हे भगवन मेरी रक्षा करो! मेरे प्राण उबारो प्रभु। अपने भक्त की आवाज सुन भगवान विष्णु तत्काल गरुण पर सवार होकर गजेंद्र को बचाने आ गए और अपने सुर्दशन चक्र से मगरमच्छ को मार गिराया। मगरमच्छ को मारने के बाद भगवान विष्णु ने कहा- ब्रह्म मुहूर्त के समय जो कोई भी गजेंद्र मोक्ष स्तुति का पाठ करेगा, उसके जीवन से सभी दुख और संकट दूर हो जाएंगे।

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र पढ़ने के फायदे -
  • मान्यता है कि कर्ज से मुक्ति के लिए गजेंद्र मोक्ष का पाठ एक अमोघ उपाय है।
  • माना जाता है कि रोजाना गजेंद्र मोक्ष का पाठ करने से मानसिक तनाव दूर हो जाता है।
  • स्तोत्र का जाप करने से जीवन में सभी प्रकार की परेशानियों से मुक्ति मिल जाती है।
  • गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र के जाप से घर में शांति आने के साथ आर्थिक स्थिति सुधरती है।
  • इसके नियमित पाठ से मुश्किल से मुश्किल समस्याओं का हल निकल आता है।
  • गजेंद्र मोक्ष का पाठ पित्तर दोष से भी मुक्ति दिलाता है।
  • माना जाता है कि गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का निरंतर भक्तिभाव से पाठ करने वाला मनुष्य सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है।
  • गजेंद्र मोक्ष का पाठ करने से मनुष्य के सभी कष्ट और विघ्नों का विनाश स्वयं भगवान विष्णु करते हैं।
  • मान्यता है कि इस स्तोत्र का पाठ करने वाला जातक मृत्यु के बाद कभी नरक में नहीं जाता।

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